Sunday, June 6, 2010

कभी माँग कर देखो आसमान मुझसे...

Dedicated to someone special :)

कभी माँग कर देखो आसमान मुझसे,
तोहफ़े मे पाओगे ख्वाबों की उढ़ान मुझसे,
तेरे आँखों की चांदनी मे अपना आशियाँ बना लूँगा,
जो चाहोगे उस चांद पर बनवाना एक मकान मुझसे।

जो माँगना है तो माँग लो आज तमाम सितारे,
कि मेरे होंठो से तेरे होंठो पे बिखर जायेंगे सारे,
और जो चाहो,तो परी,अप्सरा,या रानी बना दूँ,
मेरे दिल की सल्तनत तुम्हारी है,
जब कहो,महारानी बना दूँ !!

हसरत हो तो एक कविता भर से बना दूँ
तुमको इस जहाँ भर मे सबसे खूबसूरत,
बस ज़रा कहो तो क्या है तुम्हारी ज़रूरत!!

कि हवा का रूख बदलना कौन सा मुश्किल है,
की साँसों को साँसों से टकराने तो दो,और ज़मीं पे स्वर्ग का उतरना है मुमकिन,
कि हमे ज़रा अपने करीब आने तो दो!!

ये साँस तुम्हारी अमानत है,तुमको सौंप दूँगा,
अगर मेरी जान माँग लो मेरी जान मुझसे,
कभी माँग कर देखो आसमान मुझसे .....

Tuesday, June 1, 2010

शर्त ये है की सूरत भी बदलनी चाहिए...

कोशिश है बिन कोशिश किये कुछ लिखने की। कल शाम को बैठा भी था, I.I.T,I.I.M से जुड़े कुछ मिथक तोड़ने हेतु एक लेख को उभार के लाने के प्रयास मे । कोशिश नही,तो प्रयास ही सही। ऐसे पाँच पेज भरने के बाद भी लगा जैसे कितना कुछ और है कहने को,बहुत से ज्वलंत विचार जो भीतर कहीं सो रहे थे,उनकी निद्रा भंग हुयी थी। पर मन मस्तिष्क को रात भर के मिले आराम मे ये व्याकुलता फ़िर सुप्तवस्था को प्राप्त हो गयी।
इसके अलावा कुछ व्यंग के मुद्दो को भी आजकल मन तलाशता रहता है। कुछ दिन हुये,सरकारि दफ़्तर जाने का इत्तफ़ाक बना था,वो भी एक नही दो दो दफ़ा,तब से मन मंदिर मे उस छवि ने घर कर लिया है जिसको हम आज भ्रष्टाचार का पर्याय मानते है। इस पर व्यंगात्मक रचनायें बनाने का स्कोप तो बहुत है,पर जो बात हमपे हर पल,हर वक्त, मुँह फ़ाड़ के हँस रही है,उसका मज़ाक क्या बनाना,जिसने हमारा तमाशा बना दिया हो,उसपे कटाक्ष करके मालूम करना होगा कि बेज़्ज़ती असल मे हुई किसकी। मुद्दा ये है कि मन का भड़ास निकालने के लिये लिखना है तो लिखने से आसान क्रिया कुछ नही। साँस लेना भी नही,क्योंकि हालात और प्रदूषण के मार से साँस लेना भी अब भारी लगता है। पर उद्देश्यपूर्ण लिखना हो तो इस क्रिया से कुछ प्रतिक्रिया के उत्पन्न होनी की अपेक्षा होती है। ज़ाहिर है,असर कम ही होता है।

अजीब लगता है की महान लेखको ने हमेशा अच्छी बातें ही लिखी,और हज़ारों लाखो लोगो द्वारा वो पढ़े गये,फ़िर समाज मे इसका असर इतना कम क्यों? किताब बहुतों ने नही पढ़ी हो,सिनेमा का असर भी नही नज़र आता। सामाजिक परिवर्तन के नाते कला की ताकत पे संशय मज़बूत होता जा रहा है मेरा,जैसा की मैने कहा मन का भड़ास निकालने के लिये लिख रहे है तो ठीक है,पर उद्देश्य क्रांतिकारी हो तो निराशा "औबवियस रिज़ल्ट" लगती है। अगर असर होता, तो लेखो में,कविताओं मे,कला के विभिन्न माध्यमोँ मे मौजूद ये युगांतरकारी सत्य, झूठ और भ्रष्टाचार के किस भूल भुलैया मे खोये हुए है। मुद्दा धर्म का हो,राजनीती का या ऐसे कयी और मुद्दे, हर सीस्टम एक नैतीक ब्रेकडाऊन की ओर बढ़ता दिख रहा है। परिवर्तन अगर कलम से आ सकता है, तो वक्त आ गया है की आए,वर्ना मन के भड़ास को निकालने के और कारगर तरीके है।
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही,
शर्त ये है की सूरत भी बदलनी चाहिए ।