मैं पहले लिखने की कोशिश नही करता था,पर लिखता बहुत था। अब कोशिश बहुत करता हूँ,पर लिखता कम हूँ। पहले दिल से लिखता था,अब दिमाग से। कभी जन्नत की उम्मीद मे लिखते थे,अब जनता की उम्मीद मे लिखते है। यही बेहतर है,जन्नत तो बस अहसासों मे मिला करती थी,जनता गाहे बगाहे हकीकत मे भी मिल जाती है। पहले विचार होते थे,शब्द तलाशा करते थे,अब तो बिन विचार के ही शब्द उभरते है। अब मेरा मन जानता है,की ये जो जनता है,उसको क्या जमता है।
सचमुच जब पुरानी डायरी उठाता हूँ तो अपना लिखा सब कुछ कितना बचकाना लगता है,और ईमानदार भी। और अब सब कितना अच्छा है,और समझदारी भरा। वास्तविकता ये है की लेखन की ऐकौनौमिक्स समझ आने लगी है। मार्केटिंग के नाते "जनता ऐनालीसिस" बहुत ज़रूरी है। अब अपना टार्गेट सेक्शन निर्धारित रहता है, कहाँ पर क्या क्लिक करेगा इसकी समझ हो गयी है। और इसी प्रकार लेखन की ऐकौनौमिक्स की समझ रखने वाले कयी लोगो को पढकर अपनी समझ और भी विस्तृत हुई है।
लोग कहते है मैं अब बेहतर लिखता हूँ,एक परिपक्वता आ गयी है। सचमुच ऐसा रूप,ऐसा शृंगार इससे पहले कभी ना था। बस संशय इस बात का है कि आत्मा अब उतनी खूबसूरत नही शायद,कविता जितनी अलंकृत हो जाए,आत्मिक सौंदर्य का मुकाबला नही। हाँ उसको फ़िर पहचान पाने और सराहने वाले लोग कम ही होंगे। बस इस रूप के साथ वो आत्मा की सादगी मिल जाए एक बार इस कवि को.... इसलिये कोशिश मेरी जारी है,मेरी कविता अभी अधूरी है ...
Monday, May 31, 2010
Saturday, August 29, 2009
Dream or Vision ??
In a routine coaching class,I was asked a routine question - What is the difference between a dream and a vision ? A couple of minutes of thought into this question,and I realised this idea struck some sort of chord with me.What followed was a small discussion over it,again a routine one,but on the personal front,this differentiation between dream and vision became an object of importance.
What exactly is the answer to the above mentioned question.Like any abstract theme,the beauty lies in the very fact that it has no exact answer,it has interpretations,and opinions.Well my opinion,about the distinguishing feauture between the two,is that,Dream is anything we see for the future,Vision,apart from being a dream,has certain additional properties.Vision is also something we envisage,but it also consists of a belief that we will make that happen,or play our due role in it.Vision includes the belief that things will work out,because we will make them work.
Why did this seemingly apparent idea suddenly aquire so much of importance in my eyes.I guess all of us have dreams,even I had many.Now I have realised that average people have dreams,and the men who made it big,had visions.Its time I minimised dreaming(not end) things, and started envisioning things.
Whats your take...Dream or Vision??
What exactly is the answer to the above mentioned question.Like any abstract theme,the beauty lies in the very fact that it has no exact answer,it has interpretations,and opinions.Well my opinion,about the distinguishing feauture between the two,is that,Dream is anything we see for the future,Vision,apart from being a dream,has certain additional properties.Vision is also something we envisage,but it also consists of a belief that we will make that happen,or play our due role in it.Vision includes the belief that things will work out,because we will make them work.
Why did this seemingly apparent idea suddenly aquire so much of importance in my eyes.I guess all of us have dreams,even I had many.Now I have realised that average people have dreams,and the men who made it big,had visions.Its time I minimised dreaming(not end) things, and started envisioning things.
Whats your take...Dream or Vision??
Wednesday, July 8, 2009
रेलवे स्टेशन: एक ज़िंदगी
ये कविता मैने इस बार हिंद-युग्म की यूनिकवि प्रतियोगिता मे भेजी थी। ये शीर्ष 19 कविताओं मे भी शामिल नही हो सकी,शुरु मे मुझे काफ़ी बुरा लगा,क्योंकि एक आस तो लगी ही होती है,पर फ़िर मैने निर्णय लिया की इसे सकरात्मक रूप मे लूँ, और आगे और बेहतर लिख सकूँ ताकि हिंद-युग्म जैसे बड़े और प्रतिष्ठित मंचों पर भी एक पहचान बना सकूँ!!
आपके सुझाव और प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा।
रेलवे स्टेशन...शख्सियत कुछ ऐसी,
ज़माने वाले जिसे पहचान नही पाते,
हज़ार हज़ार बार यहाँ आने जाने वाले
मुसाफ़िर भी सही अर्थ जान नही पाते,
खुद मे छिपाए हुए एक नायाब फ़लसफ़ा,
जिसे फ़्रूट स्टौल का रामू,बुक स्टौल का शंभू,
ही समझ सकता है,और समझा सकता है,
क्योंकि साथ इतना वक्त जो बिताया है,
या फ़िर बता सकता है,शायद एक कवि,
एक मामूली से स्टेशन मे भी जिसको,
ज़िंदगी का संपूर्ण सार नज़र आता है।
ज़िंदगी और स्टेशन...एक जैसे,कैसे,
स्टेशन एक मंज़िल भी है,एक सफ़र भी,
कोई बस चलता रहता है दिन भर कभी,
कभी कोई बैठा रह जाता है रात भर भी,
शायद किसी ने इसपे गौर ना किया हो,
यहाँ हर इंसान आता है,चले जाने के लिये,
और हर आने वाले को किसी ना किसी
का इंतज़ार होता है,ज़िंदगी भी तो बस,
बस,एक मुकम्मल इंतज़ार ही होती है,
और भला कैसा होता है इंतज़ार वहाँ,
हमे किसी के आने का इंतज़ार रहता है,
या अपने चले जाने का इंतज़ार रहता है,
मोहब्बत हो जाये,तो ज़िंदगी भी यही है।
जीवन मे लोग कितनी प्लानिंग किया करते है,
इसका,उसका,सबका,वक्त निर्धारित किया करते है,
पर तय नही होता कुछ,एक अंदाज़ा भर होता है,
हमारी ज़िंदगी की टाईमिंग हो,या रेलवे मे
ट्रेनों के आने जाने की,कुछ खास अलग नही,
एक दूजे के प्रारूप ही लगते है ये दोनो,ज़िंदगी,
और ज़िंदगी का एक छोटा सा पहलू।
इतना कुछ समान है,तो फ़र्क भी होगा,
फ़िर अपना कवि ही काम आता है,
और सूक्ष्मरूपी कुछ अंतर बतलाता है,
स्टेशन पे कौन कब आएगा,जाएगा,
इसकी घोषणा पहले ही हो जाती है,
ज़िंदगी मे अक्सर ऐसा नही होता,
कौन कहाँ से जाएगा,कहाँ पे आएगा,
ये भी बस स्टेशन पे ही तय रहता है,
तो अंत मे कवि बस इतना कहता है...
अगली बार प्लेटफ़ौर्म पे बैठे,आते जाते,
जाते आते, इसको उसको,उसको इसको,
देखो तो एक बार सोचना,रेलवे स्टेशन,
और ज़िंदगी,ने मिलके साजिश की है,
और भगाए जा रहे है...हर शख्श को बेतहाशा ।।
आपके सुझाव और प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा।
रेलवे स्टेशन...शख्सियत कुछ ऐसी,
ज़माने वाले जिसे पहचान नही पाते,
हज़ार हज़ार बार यहाँ आने जाने वाले
मुसाफ़िर भी सही अर्थ जान नही पाते,
खुद मे छिपाए हुए एक नायाब फ़लसफ़ा,
जिसे फ़्रूट स्टौल का रामू,बुक स्टौल का शंभू,
ही समझ सकता है,और समझा सकता है,
क्योंकि साथ इतना वक्त जो बिताया है,
या फ़िर बता सकता है,शायद एक कवि,
एक मामूली से स्टेशन मे भी जिसको,
ज़िंदगी का संपूर्ण सार नज़र आता है।
ज़िंदगी और स्टेशन...एक जैसे,कैसे,
स्टेशन एक मंज़िल भी है,एक सफ़र भी,
कोई बस चलता रहता है दिन भर कभी,
कभी कोई बैठा रह जाता है रात भर भी,
शायद किसी ने इसपे गौर ना किया हो,
यहाँ हर इंसान आता है,चले जाने के लिये,
और हर आने वाले को किसी ना किसी
का इंतज़ार होता है,ज़िंदगी भी तो बस,
बस,एक मुकम्मल इंतज़ार ही होती है,
और भला कैसा होता है इंतज़ार वहाँ,
हमे किसी के आने का इंतज़ार रहता है,
या अपने चले जाने का इंतज़ार रहता है,
मोहब्बत हो जाये,तो ज़िंदगी भी यही है।
जीवन मे लोग कितनी प्लानिंग किया करते है,
इसका,उसका,सबका,वक्त निर्धारित किया करते है,
पर तय नही होता कुछ,एक अंदाज़ा भर होता है,
हमारी ज़िंदगी की टाईमिंग हो,या रेलवे मे
ट्रेनों के आने जाने की,कुछ खास अलग नही,
एक दूजे के प्रारूप ही लगते है ये दोनो,ज़िंदगी,
और ज़िंदगी का एक छोटा सा पहलू।
इतना कुछ समान है,तो फ़र्क भी होगा,
फ़िर अपना कवि ही काम आता है,
और सूक्ष्मरूपी कुछ अंतर बतलाता है,
स्टेशन पे कौन कब आएगा,जाएगा,
इसकी घोषणा पहले ही हो जाती है,
ज़िंदगी मे अक्सर ऐसा नही होता,
कौन कहाँ से जाएगा,कहाँ पे आएगा,
ये भी बस स्टेशन पे ही तय रहता है,
तो अंत मे कवि बस इतना कहता है...
अगली बार प्लेटफ़ौर्म पे बैठे,आते जाते,
जाते आते, इसको उसको,उसको इसको,
देखो तो एक बार सोचना,रेलवे स्टेशन,
और ज़िंदगी,ने मिलके साजिश की है,
और भगाए जा रहे है...हर शख्श को बेतहाशा ।।
Saturday, July 4, 2009
कभी कभी गुज़रा वक्त गुज़रता नही
एक शाम को एक दिन, एक,दिन चुपके से आया,
दिन बोला,मेरे बिन तू,
अब तक कैसे रह पाया,
मेरे बीत जाने के बाद,
वक्त तूने कैसे बिताया ।
मैने ही तेरा हाथ पकड़,
उसके हाथों मे दे डाला था,
मेरा दिया दीवानापन था तूने,
दिल का अरमान निकाला था, अचानक जो मैं पीछे छूट गया,
भला खुद को कैसे संभाला था।
गुमसुम सा ताक रहा था,
बीते दिन की परछाई को,
अपनी तड़प,मजबूरी सारी,
बता गया उस सौदाई को,
एक मोड़ पे तू पीछे छूटा, अगली गली पे वो आई थी,
तू तो बीत गया लेकिन,
तेरी याद दिल मे समाई थी, गुज़रा वक्त गुज़रता नही,
अपनी खूश्बू दे जाता है,
अपने पीछे तन्हाई को,
गुमसुम सा ताक रहा था,
बीते दिन की परछाई को...
Wednesday, July 1, 2009
जागृति
बीता एक और दिन,
बीती एक और शाम,
और,कुछ और नाम,
जुड़े ज़िंदगी से मेरे,
हज़ार जतन के बाद,
कुछ को मना लिया,
कुछ रूठे बिन बात,
मेरे सामने खड़ी है,
देखो,एक और रात,
हर दिन,शाम,और रात
की तरह,बीत जाने को,
सोने जा रहा हूँ मैं,
अपने भीतर,फ़िर एक,
सुबह को जगाने को ...
Tuesday, June 30, 2009
ज़िंदगी गुज़ारी अपनी शर्तों पे हमने ...
फ़िर एक ख्वाब को हकीकत बना लिया,
हमने आज एक और मुकाम पा लिया ।
ज़िम्मेदारियों के प्रति ये आँखें खुली भी,
और नींद मे भी एक सपना सजा लिया।
मोहब्बत तो सिर्फ़ कमज़ोर करती आई थी,
सब भुला इस मकसद से दिल लगा लिया।
जोश और जज़्बे मे तो अब कमी नही होगी,
मेरे मुकद्दर ने भी देखो ऐसा फ़ैसला लिया ।
ज़िंदगी तमाम गुज़ारी अपनी शर्तों पे हमने,
मौत को अपनी मर्ज़ी का गुलाम बना लिया।
हमने आज एक और मुकाम पा लिया ।
ज़िम्मेदारियों के प्रति ये आँखें खुली भी,
और नींद मे भी एक सपना सजा लिया।
मोहब्बत तो सिर्फ़ कमज़ोर करती आई थी,
सब भुला इस मकसद से दिल लगा लिया।
जोश और जज़्बे मे तो अब कमी नही होगी,
मेरे मुकद्दर ने भी देखो ऐसा फ़ैसला लिया ।
ज़िंदगी तमाम गुज़ारी अपनी शर्तों पे हमने,
मौत को अपनी मर्ज़ी का गुलाम बना लिया।
Sunday, June 28, 2009
इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया,वर्ना हम भी आदमी थे काम के!!
ये विडियो मुझे भाटिया सर के ब्लौग पे मिला। एक मज़ेदार विडियो है पर शायद सिर्फ़ इसका मज़ा लेकर देख लेना भर ठीक नही,इसमे चार युवाओं के जिस बर्ताव को दिखाया गया है,वो या तो नैतिक रूप से गलत है या फ़िर गैर ज़िम्मेदार है,मूर्ख चाहे जो हो,सही तो कोई नही। दुखद बात ये है की,ऐसी घटनायें सचमुच आम है। सिगरेट और शराब की तरह कयी लड़को का भविष्य लड़कियों के हाथों भी शहीद होता है।इनमे हर मामले मे युवा अपनी बेवकूफ़ी का खामियाज़ा भुगतते है,पर तीसरे पहलू को कभी गँभीरता से नही लिया गया,जबकी नशा-मुक्ति हमारा एक खास मकसद है आज। मेरे एक मित्र का तकियाकलाम है - प्यार मे आदमी कुत्ता बन जाता है... प्यार मे तो नही,प्यार की गलतफ़हमी मे पड़के इंसान कुत्तेपन के करीब ज़रूर आ जाता है। आप लोगो को शायद लगे की मैं एक छोटी सी बात को अधिक तवज्जो दे रहा हूँ,तो अगर आप अब भी इस बात से सहमत नही हुये है कि ये बात उतनी छोटी और गैर-ज़रूरी नही है जैसी लगती है,तो आप शायद मेरी बात से सहमत कभी ना हो।और अगर आपको मेरी बात मे कोई गंभीरता,कोई तुक नज़र आता हो,तो आपके विचारों का मुझे इंतज़ार है। नोट: मेरे ये विचार काल्पनिक नही है,कयी लोगो के जीवन से इसकी समानता हो सकती है,शायद उसमे मेरा भी जीवन हो!!
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