Saturday, July 4, 2009

कभी कभी गुज़रा वक्त गुज़रता नही

एक शाम को एक दिन, एक,दिन चुपके से आया,
दिन बोला,मेरे बिन तू,
अब तक कैसे रह पाया,
मेरे बीत जाने के बाद,
वक्त तूने कैसे बिताया ।

मैने ही तेरा हाथ पकड़,
उसके हाथों मे दे डाला था,
मेरा दिया दीवानापन था तूने,
दिल का अरमान निकाला था, अचानक जो मैं पीछे छूट गया,
भला खुद को कैसे संभाला था।

गुमसुम सा ताक रहा था,
बीते दिन की परछाई को,
अपनी तड़प,मजबूरी सारी,
बता गया उस सौदाई को,
एक मोड़ पे तू पीछे छूटा, अगली गली पे वो आई थी,
तू तो बीत गया लेकिन,
तेरी याद दिल मे समाई थी, गुज़रा वक्त गुज़रता नही,
अपनी खूश्बू दे जाता है,
अपने पीछे तन्हाई को,
गुमसुम सा ताक रहा था,
बीते दिन की परछाई को...

Wednesday, July 1, 2009

जागृति

बीता एक और दिन,

बीती एक और शाम,

और,कुछ और नाम,

जुड़े ज़िंदगी से मेरे,

हज़ार जतन के बाद,

कुछ को मना लिया,

कुछ रूठे बिन बात,

मेरे सामने खड़ी है,

देखो,एक और रात,

हर दिन,शाम,और रात

की तरह,बीत जाने को,

सोने जा रहा हूँ मैं,

अपने भीतर,फ़िर एक,

सुबह को जगाने को ...

Tuesday, June 30, 2009

ज़िंदगी गुज़ारी अपनी शर्तों पे हमने ...

फ़िर एक ख्वाब को हकीकत बना लिया,
हमने आज एक और मुकाम पा लिया ।

ज़िम्मेदारियों के प्रति ये आँखें खुली भी,
और नींद मे भी एक सपना सजा लिया।

मोहब्बत तो सिर्फ़ कमज़ोर करती आई थी,
सब भुला इस मकसद से दिल लगा लिया।

जोश और जज़्बे मे तो अब कमी नही होगी,
मेरे मुकद्दर ने भी देखो ऐसा फ़ैसला लिया ।

ज़िंदगी तमाम गुज़ारी अपनी शर्तों पे हमने,
मौत को अपनी मर्ज़ी का गुलाम बना लिया।

Sunday, June 28, 2009

इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया,वर्ना हम भी आदमी थे काम के!!

ये विडियो मुझे भाटिया सर के ब्लौग पे मिला। एक मज़ेदार विडियो है पर शायद सिर्फ़ इसका मज़ा लेकर देख लेना भर ठीक नही,इसमे चार युवाओं के जिस बर्ताव को दिखाया गया है,वो या तो नैतिक रूप से गलत है या फ़िर गैर ज़िम्मेदार है,मूर्ख चाहे जो हो,सही तो कोई नही। दुखद बात ये है की,ऐसी घटनायें सचमुच आम है। सिगरेट और शराब की तरह कयी लड़को का भविष्य लड़कियों के हाथों भी शहीद होता है।इनमे हर मामले मे युवा अपनी बेवकूफ़ी का खामियाज़ा भुगतते है,पर तीसरे पहलू को कभी गँभीरता से नही लिया गया,जबकी नशा-मुक्ति हमारा एक खास मकसद है आज। मेरे एक मित्र का तकियाकलाम है - प्यार मे आदमी कुत्ता बन जाता है... प्यार मे तो नही,प्यार की गलतफ़हमी मे पड़के इंसान कुत्तेपन के करीब ज़रूर आ जाता है। आप लोगो को शायद लगे की मैं एक छोटी सी बात को अधिक तवज्जो दे रहा हूँ,तो अगर आप अब भी इस बात से सहमत नही हुये है कि ये बात उतनी छोटी और गैर-ज़रूरी नही है जैसी लगती है,तो आप शायद मेरी बात से सहमत कभी ना हो।और अगर आपको मेरी बात मे कोई गंभीरता,कोई तुक नज़र आता हो,तो आपके विचारों का मुझे इंतज़ार है। नोट: मेरे ये विचार काल्पनिक नही है,कयी लोगो के जीवन से इसकी समानता हो सकती है,शायद उसमे मेरा भी जीवन हो!!

Saturday, June 27, 2009

इंटर कौलेज आयोजन का नामकरण

आज अपने ब्लौगिंग साथियों से एक मदद चाहता हूँ। हमारे कौलेज,बी।आई।टी मेसरा,राँची,मे एक इंटर कौलेज ड्रामा फ़ेस्ट हो रहा है।इसमे देश के विभिन्न कौलेजों से आये छात्र अलग अलग छेत्रों मे अपनी प्रतिभा दिखायेंगे। इस आयोजन मे मुख्यत: नाटक,नुक्कड़ और लघु फ़िल्मों के बीच मुकाबला होगा।अभी तक हमने इसका नाम नही तय किया है।ऐसे मेरा सुझाया नाम "अभिव्यक्ति" सबको ठीक लगा है,पर ये तय नही है और हम अब भी एक शानदार नाम कि तलाश मे है। आप लोग अगर साहित्य के सागर से कोई ऐसा मोती चुन सके जो इस आयोजन के नामकरण मे सहायक सिद्ध हो तो मुझे बड़ी खुशी होगी। नाम कुछ ऐसा हो जिसमे नाटक,रचनात्मकता और शौर्ट फ़िल्मों की मिली जुली थीम उभर के आ सके। इसके अलावा यहाँ के सक्षम लेखक और लेखिका गण कोई और सलाह देना चाहे तो उसका स्वागत है।

Wednesday, June 24, 2009

तेरा एहसास मानो आसमाँ से बरस रहा था...

पंख फ़ड़फ़ड़ाते हुए गुज़रा तेरा नाम सामने से।
मौसम की पुकार पे गुज़र रही है शाम सामने से।।

अभी चार पल पहले ही तो मैं रिमझिम की
बस एक आवाज़ के लिये तरस रहा था,
दो पल ही गुज़रे होंगे, की ये देखता हूँ,
तेरा एहसास मानो आसमाँ से बरस रहा था,
देख सिर से पाँव तक भींगने लगे लोग सारे,
और मैं,मेरी तो आँखें तक भींग गयी थी,
शायद यही तेरी याद का वो कामयाब आँसू था,
जिसको पाके आज मैं खिलखिलाके हँस रहा था,
तेरा एहसास मानो आसमाँ से बरस रहा था...

पेड़ सारे पहले से कुछ ज़्यादा ही हरे हो गये थे,
कुछ घोंसले शायद मुझे देखकर हाथ हिला रहे थे,
आकाश मे कुछ अधबरसे बादल थे,जो बीत रहे थे,
इशारों इशारों मे मुझे भी अपने पास बुला रहे थे,
खुश और आश्वस्त सा मैं टेरेस पे टहल रहा था,
कुछ भी नही कर रहा था पर मन बहल रहा था,
एक अकेली ज़िंदगी ऐसी कितनी शामें दे जाती है,
जीवन कितना प्यारा है,सब एहसास दिला रहे थे,
कुछ घोंसले शायद मुझे देखकर हाथ हिला रहे थे...

Monday, June 22, 2009

आँखों मे जल रहा है क्यों...

आज सुबह रोशनी
जब पहली बार मेरे,
कमरे मे आई,
थोड़ा छेड़ा मुझको,
ज़रा सा मुस्कुराई,
बोली,रोज़ आती हूँ मैं,
तेरा अंधेरा फ़िर,
मेरा हो जाता है,
मुझमे खो जाता है,
मैं छू लेती हूँ तुमको,
तुम्हारे इस कमरे को,
इस कमरे मे मौजूद,
हरेक चीज़ को,
कुछ भी तो अछूता
नही मुझसे,सिवाय,
तेरी आँखों के...
छू नही सकी इनको,
आज तक,अब तलक,
दर्द की जाने कौन सी
दीवार से इनको घेरा है,
जाने क्यों आज तक,
यहाँ इतना अंधेरा है !!!