Tuesday, June 1, 2010

शर्त ये है की सूरत भी बदलनी चाहिए...

कोशिश है बिन कोशिश किये कुछ लिखने की। कल शाम को बैठा भी था, I.I.T,I.I.M से जुड़े कुछ मिथक तोड़ने हेतु एक लेख को उभार के लाने के प्रयास मे । कोशिश नही,तो प्रयास ही सही। ऐसे पाँच पेज भरने के बाद भी लगा जैसे कितना कुछ और है कहने को,बहुत से ज्वलंत विचार जो भीतर कहीं सो रहे थे,उनकी निद्रा भंग हुयी थी। पर मन मस्तिष्क को रात भर के मिले आराम मे ये व्याकुलता फ़िर सुप्तवस्था को प्राप्त हो गयी।
इसके अलावा कुछ व्यंग के मुद्दो को भी आजकल मन तलाशता रहता है। कुछ दिन हुये,सरकारि दफ़्तर जाने का इत्तफ़ाक बना था,वो भी एक नही दो दो दफ़ा,तब से मन मंदिर मे उस छवि ने घर कर लिया है जिसको हम आज भ्रष्टाचार का पर्याय मानते है। इस पर व्यंगात्मक रचनायें बनाने का स्कोप तो बहुत है,पर जो बात हमपे हर पल,हर वक्त, मुँह फ़ाड़ के हँस रही है,उसका मज़ाक क्या बनाना,जिसने हमारा तमाशा बना दिया हो,उसपे कटाक्ष करके मालूम करना होगा कि बेज़्ज़ती असल मे हुई किसकी। मुद्दा ये है कि मन का भड़ास निकालने के लिये लिखना है तो लिखने से आसान क्रिया कुछ नही। साँस लेना भी नही,क्योंकि हालात और प्रदूषण के मार से साँस लेना भी अब भारी लगता है। पर उद्देश्यपूर्ण लिखना हो तो इस क्रिया से कुछ प्रतिक्रिया के उत्पन्न होनी की अपेक्षा होती है। ज़ाहिर है,असर कम ही होता है।

अजीब लगता है की महान लेखको ने हमेशा अच्छी बातें ही लिखी,और हज़ारों लाखो लोगो द्वारा वो पढ़े गये,फ़िर समाज मे इसका असर इतना कम क्यों? किताब बहुतों ने नही पढ़ी हो,सिनेमा का असर भी नही नज़र आता। सामाजिक परिवर्तन के नाते कला की ताकत पे संशय मज़बूत होता जा रहा है मेरा,जैसा की मैने कहा मन का भड़ास निकालने के लिये लिख रहे है तो ठीक है,पर उद्देश्य क्रांतिकारी हो तो निराशा "औबवियस रिज़ल्ट" लगती है। अगर असर होता, तो लेखो में,कविताओं मे,कला के विभिन्न माध्यमोँ मे मौजूद ये युगांतरकारी सत्य, झूठ और भ्रष्टाचार के किस भूल भुलैया मे खोये हुए है। मुद्दा धर्म का हो,राजनीती का या ऐसे कयी और मुद्दे, हर सीस्टम एक नैतीक ब्रेकडाऊन की ओर बढ़ता दिख रहा है। परिवर्तन अगर कलम से आ सकता है, तो वक्त आ गया है की आए,वर्ना मन के भड़ास को निकालने के और कारगर तरीके है।
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही,
शर्त ये है की सूरत भी बदलनी चाहिए ।

7 comments:

pawan dhiman said...

सजल जी ! इससे बेहतर विकल्प क्या है कि हम बिना निराश हुए मन, वचन और कर्म से दुनिया की बेहतरी के लिए अपना योगदान दें? अपने व्यक्तित्व में उन सब तत्वों का समावेश करने का प्रयास करें , जिन्हें हम दूसरों में देखना चाहते हैं.

Udan Tashtari said...

कलम से ही न जाने कितनी क्रांतियाँ आई हैं..उस पर विश्वास रखना होगा. फिर फिर इतिहास दुहरायेगा खुद को.

आचार्य जी said...

क्रोध पर नियंत्रण स्वभाविक व्यवहार से ही संभव है जो साधना से कम नहीं है।

आइये क्रोध को शांत करने का उपाय अपनायें !

दिलीप said...

badhiya aalekh

Visvir Hahs said...

Kuch karna tha mujhko par kar nahi paya
Kuch badalna tha mujhko par badal nahi paya
Parivartan ki ore bhatakta mann fir mera sustayaa
Par kranti ki law tab fir prajwalit hui jab mere jaiso ko maine kuch karte paya
Likhte paya...

Its important not to be drawn into writing just for satire cause as u have brilliantly questioned this world of writers-"Majaak kiska ban raha hai ant mein?"

But its important to voice out the need for change...Its more than a help to see that ur not alone in this quest to bring about change...
The reader at least I hope thinks-"Ussne toh likh ke kuch kar dikhaya....ab parivartan laana meri baari hai".


Another brilliant post....Hats off sir!!!

Pyaasa Sajal said...

Viraj...at times I feel that your comments are better than my post itself(honestly)

Visvir Hahs said...

Bhaiya please.....mujhe sharminda mat kijiye....

u r the prsn who shows the way...holds the compass....i just tell u where i believe North is...
Arey u give me too much credit....Your humble and modest...the most imp characteristics of a great man in the making...I am obliged to hav been inspired and encouraged by u..Keep blogging...waiting for more..