Saturday, December 27, 2008

है और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे,कहते है की गालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और...



मिर्ज़ा गालिब..एक नाम नही एक मुकाम है..आज(27 दिसंबर) उनकी 212वीं जयंती है...मैं गालिब जी को याद करते हुये,उनके दस शेर जो मुझे बहुत पसंद है वो पाठकों से बाँटता हू...इनके हज़ारों शेरों में से ये दस शेर चुन लेना,ईमानदारी से कहू तो एक 'फ़ौर्मलिटी' ही है..बस मियाँ असद को आज के दिन याद करना था,और वो पाठक जो भूल गये हो,उनको याद दिलाना था तो सोचा कुछ शेरों से रू-ब-रू हो ले...गालिब हमारे बीच है और हमेशा रहेंगे...आमीन



इश्क ने 'गालिब' निकम्मा कर दिया।
वरना हम भी आदमी थे काम के।।

उभरा हुआ नकाब में है उनके एक तार।
डरता हू मैं कि ये न किसी की निगाह हो।।

आह को चाहिये एक उम्र असर होने तक।
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।।


हर कदम दूरी-ए-मंज़िल है नुमायां मुझसे।
मेरी रफ़्तार से भागे है बयाबां मुझसे।।

नक्शे-फ़रियादी है किसकी शोखि-ए-तहरीर का।
कागज़ी है पैरहन हर पैकरे-तस्वीर का।।

'गालिब' बुरा ना मान जो वाईज़ बुरा कहे।
ऐसा भी कोई है सब अच्छा कहे जिसे।।

उनके देखे से आ जाती है मुँह पर रौनक।
वो समझते है बीमार का हाल अच्छा है।।

हम है मुश्ताक और वो बेज़ार।
या इलाही, ये माजरा क्या है।।

जब की तुझ बिन नही कोई मौजूद।
फ़िर ये हंगामा-ऎ-खुदा क्या है।।

ज़िक्र उस परीवश का और फ़िर बयाँ अपना।
बन गया रकीब आखिर,जो था राज़दाँ अपना।।

33 comments:

Shashwat Shekhar said...

क्या बात है भाई| ग़ालिब की याद दिलाने का शुक्रिया|
"दुनिया में है सुखनवर बहुत अच्छे,कहते है गालिब का है " को बदलकर "हैं और भी दुनिया में.............." कर दें|

Shashwat Shekhar said...

मेरे ग़ालिब के कुछ पसंदीदा शेर...
"सँभालने दे मुझे ए ना उम्मीदी क्या क़यामत है,
की दामन-ऐ-ख्याल-ऐ-यार छूता जाए है मुझसे"

" क़यामत है की होवे मुद्दई का हमसफ़र ‘ग़ालिब’
वो काफिर, जो खुदा को भी ना सौंपा जाए है मुझसे"

आपका बहुत बहुत धन्यवाद|

Shashwat Shekhar said...

उभरा हुआ नकाब में है उनके एक तार।
डरता हू मैं कि ये न किसी की निगाह हो।।

क्या खुबसूरत शेर है दोस्त|मजा आ गया| पहली बार पढ़ा ये| शुक्रिया आपका|

विनय said...

जिस बज़्म में, तू नाज़ से, गुफ़्तार में आवे
जाँ, काल्बुद-ए-सूरत-ए-दीवाए में आवे

साये की तरह साथ फिरें सर्व-ओ-सनोबर
तू इस क़द-ए-दिलकश से, जो गुल्ज़ार में आवे

.
.
.

गँजीना-ए-मानी का तिलिस्म उसको समझिये
जो लफ़्ज़ कि ग़ालिब, मिरे अश'आर में आवे

चचा असद को मेरा सलाम!

Pyaasa Sajal said...

Vinay Ji...aapne bahut prerit kiya hai janaab..is baar to aapka andaaz behad niraala laga

Pyaasa Sajal said...

@ Shashwat Sir..

wo jaan boojhke galat likha tha..exact share likhne ka mood nahi tha title mein...chaliye aapki ichhanusaar fer badal kar diye gaye hai

Galib Chacha ko to humari ghazal likhne ki har koshish yaad karti hai...humara ek shayraana khyaal yaad karta hai...jaisa maine kaha maine to ek formality nibhaaye hai..aapko achha laga koshish safal huyee

aapke sunaaye do sher bhi mujhe behad azeez hai,khaaskar pehla waala..shukriyaa :)

Dr. Amar Jyoti said...

बहुत ख़ूब!

MUFLIS said...

Huzoor ! aadaab !
Mirza Ghalib par baateiN aur ah`aar tehreer farmaaye aapne, shukriyaa...
aur Ghalib miyaaN to ek auliyaa shkhsiyat ke maalik rahe haiN,
ek ehad.saaz musannif..unka to poora kalaam hi phalsephana andaaz liye hue hai..ye sher bhi bahot asar chhorta hai...
"sambhalne de mujhe ae naumeedi kya qyamat hai,
k daamaan.e.khyaal.e.yaar chhoota
jaaye hai mujhse.."
ab kis kis ka zikr kiya jaye.
khair..! aapko bahot bahot mubaarakbaad pesh karta hooN, qubool farmaaiiega .
---MUFLIS---

sareetha said...

गजल जी ’
मिर्ज़ा असद उल्लाह ’गालिब’ आपकी चार पीढी पह्ले वाले पूर्वजों के चचाजान रहे हैं । और हां शेर को जान बूझकर गलत लिखने की अदा भी खूब है गजल जी , ओह सारी सजल जी ....। नाम तो आपका मालूम था मगर बस ऎसे ही suddenly .....।

bhoothnath said...

एक भाई ने आज ग़ालिब की याद दिला दी.....और जिक्र ग़ालिब का आते ही मैं बावला सा हो जाता हूँ......आज से कोई बीस साल या उससे भी कहीं पहले दीवाने-ग़ालिब को अपने हाथों से अपनी डायरी में सधे हुए हर्फों में उकेरा था.....तब से कितने ही मौसम आए-गए.....मैं उन्हें गुनगुनाता ही रहा....बरसों बाद गुलज़ार साहब के मिर्जा ग़ालिब में नसरुद्दीन शाह.....जगजीत सिंह....और ख़ुद गुलज़ार जैसे एकमेक हो गएँ.....तीनो की आवाजें जैसे ग़ालिब की आवाजें बन गयीं....और नसीर भाई जैसे साक्षात् ग़ालिब.....अपने घर में मैं अकेला यह सीरियल देखता था.....और जगजीत द्वारा गायीं गयीं ग़ालिब की ग़ज़लें मेरे जेहन में हमेशा के लिए अंकित हो गयीं.....इन्हें ही गुनगुनाता जीता चलता हूँ....ग़ालिब को मैंने गाफिल कर लिया है.....मैं ग़ालिब तो हो नहीं सकता था इसलिए गाफिल हो गया......आज ग़ालिब की बड़ी याद आ रही है और मेरे जेहन में उनके शेर हवाओं की तरह सरसरा रहे हैं....और मुझे तरो-ताज़ा करते हुए मेरे गले से लिपटते हुए मेरे पोर-पोर में समा जा रहे हैं.....पूरा दीवान तो कैसे पेश करूँ....कुछ शेर ही सही....आप भी इनमें समा कर देख लो ना....कहीं गहरे ही डूब जाओगे.....सच.....हाँ सच....!!!!!

"ना था कुछ तो खुदा था,कुछ ना होता तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, ना होता मैं, तो क्या होता !!"
"कैदे-हयात-ओ-बन्दे-गम असल में दोनों एक हैं...
मौत से पहले आदमी गम से निजात पाये क्यूँ..."
"बाज़ीचा-ऐ-इत्फाल है दुनिया मेरे आगे..
होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे.."
" जला है जिस्म जहाँ, दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है ?"
"रही ना ताकते-गुफ्तार और अगर हो भी...
तो किस उम्मीद पे कहिये कि आरजू क्या है!"
"गमे-हस्ती का असद किससे हो जुज़ मर्ग इलाज़
शमां हर रंग में जलती है सहर होने तक...!!"
"इश्क मुझको नहीं वहशत ही सही
मेरी वहशत तेरी शोहरत ही सही
हम कोई तर्क-ऐ-वफ़ा करते हैं
ना सही इश्क मुसीबत ही सही"
"दे के ख़त मुंह देखता है नामाबर
कुछ तो पैगाम-ऐ-जबानी और है
हो चुकी"गालिब"बलाएँ सब तमाम
एक मर्ग-ऐ-नागाहानी और है "
"दिल ही-संगोखिर्श्त,दर्द से भर ना आए क्यूँ
रोयेंगे हज़ार बार कोई हमें सताए क्यूँ "
गालिबे-खास्ता के बगैर कौन से काम बंद हैं
रोईये जार-जार क्या,कीजिये हाय-हाय क्यूँ"
"कम जानते थे हम भी गमे-इश्क को,पर अब
देखा तो कम हुए पे गम-ऐ-रोज़गार था "
(कम होने पर भी संसार भर के ग़मों के बराबर था...!)
"था जिंदगी में मौत का खटका लगा हुआ..
उड़ने से पेशतर भी मेरा रंग ज़र्द था !!"
''बकद्रे-ज़र्फ़ है साकी खुमार-ऐ-तश्नाकामी भी
जो तू दरिया-ऐ-मय है तो मैं खमयाज़ा हूँ साहिल का "
"बस के दुश्वार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसा होना "
"दोस्त गमख्वारी में मेरी सअई फरमाएंगे क्या
ज़ख्म भरने तलक नाखून ना बढ़ आयेंगे क्या "
( सअई=सहायता )
'ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह (उपदेशक)
कोई चारासाज़ होता कोई गमगुसार होता "
"कहूँ किससे मैं कि क्या है,शबे-गम बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता "
''थी ख़बर गर्म कि "ग़ालिब" के उडेंगे पूर्जे
देखने हम भी गए थे पै तमाशा ना हुआ "
"ले तो लूँ सोते में उसके पावन का बोसा मगर
ऐसी बातों से वो काफिर बदगुमा हो जायेगा "
''कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रकीब
गालियाँ खाके भी बे मज़ा ना हुआ "
"ग़ालिब"बुरा ना मान जो वाईज बुरा कहे
ऐसा भी कोई है सब अच्छा कहें जिसे !!"
"मगर लिखवाये कोई उसको ख़त तो तो हमसे लिखवाये
हुई सुबह और घर से कान पर धरकर कलम निकले...
मुहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का
उसीको देखकर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले "

"अर्श" said...

दोनों जहाँ देके वो समझे ये ख़ुश रहा
यां आ पड़ी ये शर्म की तकरार क्या करें

थक थक के हर मक़ाम पे दो चार रह गये
तेरा पता न पायें तो नाचार क्या करें



ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
कभी सबा को, कभी नामाबर को देखते हैं

वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत हैं!
कभी हम उमको, कभी अपने घर को देखते हैं

नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को
ये लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्मे जिगर को देखते हैं



इस हस्ती को मेरा सलाम...

PD said...

वाह बंधुवर.. यहां तो एक महफिल जमी लगती है, जो मरहूम गालिब के शेरों से आबाद है..
बहुत खूब.. :)

रश्मि प्रभा said...

'गालिब' बुरा ना मान जो वाईज़ बुरा कहे।
ऐसा भी कोई है सब अच्छा कहे जिसे।।
.........
gaalib ki yaad share karne ke liye shukriyaa

गौतम राजरिशी said...

शुक्रिया मेहरबानी...पहले तो हमारी हौसलाअफ़जाई के लिये और फिर दुजे चचा गालिब का जनम-दिन मनाने के लिये

Pyaasa Sajal said...

sabke saath Ghalib ji ko yaad karke mazaa aaya :)

saath dene ke liye shukriya...yehi umeed hai ki shayar-parivaar is mauke ko hamesha yaad rakhe :)

Pyaasa Sajal said...

Dr.Amar Jyoti..
Muflis Ji...
Bhoothnaath saab...
Sareetha mam...

aap log pehli baar yahaan aaye hai to aadatanusaar aapko alag se salaam karta hoon aur dhaynvaad deta hoon :)

Pyaasa Sajal said...

Bhoothnaath Sir...aapke aane se to mehfil ki shaan aur badh gayee...saare sher padhke mazaa aaya..tahe dil se shukriyaa

Pyaasa Sajal said...

Sareetha Chachee...

title tha post ka,jahaan exact share nahi likhna chahta tha main...jaisa aapne kaha...bas aise hi...
no offences...vaise ab sudhaar kar diya hai aap logo ki khushi ke liye :)
baaki "chacha" sambodhan pe koi aitraaz hai to ab "ji" se hi kaam chala loonga
ek baar fir dhanyvaad aapka..

राज भाटिय़ा said...

'गालिब' बुरा ना मान जो वाईज़ बुरा कहे।
ऐसा भी कोई है सब अच्छा कहे जिसे।।
अरे बाप रे यहा जो एक से बढ कर एक शायर आये हुये है, भईया हम चले, बस हमारी दाद कबूल फ़रमाये,
राम राम जी की

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

galib ke baare me kuchh kahana suraj ko diya dikhane jaisa hoga ..bahut dhnyawaad aapka unki yaad ko yhan batane ke liye.

Ashish said...

dekh bhai mujhe shayari samajh mein nahi aati.......
but ur list of shayaris is good and I did understand them :)

divya said...

Ghalib ko arse se padhti aayi hoon...jitni baar bhi padha hai lagta hai iss baar samajh payi hoon ghalib ko....par janti hoon..taumr padhti rahungi aur yehi mehsoos hoga...
'baazeecha-e-atfaal hai duniya mere aage'...
'royenge hum hazaar baar koi hume sataye kyu'...
kayi sher hai jo yaad aa rahe hai....
shukriya sajal...

divya said...

http://rublygr8.blogspot.com/2008/10/ek-drishtikon.html

अल्पना वर्मा said...

aaj hi samachar padha ki 'Ghalib sahab ' ke apne shahar mein un ka koi smarak nahin hai!

ek mahaan shayar ki aisee upeksha kyun hai??

seema gupta said...

"है कहाँ तमन्ना का दूसरा कदम या रब हम ने दश्त -ऐ -इमकान को एक नक्श -ऐ-पा पाया " (Ghalib)
fir kuchch is dil ko beqaraaree hai
seena zoya-e-zaKHm-e-kaaree hai

[ zoya = searcher, zaKHm-e-kaaree = deep wound ]

2. fir jigar khodane laga naaKHun
aamad-e-fasl-e-laala_qaaree hai

[ aamad = arrival, fasl = season/harvest ]

3. qibla-e-maqsad-e-nigaah-e-niyaaz
fir wahee parda-e-'amaaree hai

[ niyaaz = desire, 'amaaree = rider's seat with a canopy on an
elephant or camel ]

4. chashm-e-dallaal -e- jins-e-ruswaaee
dil KHareedaar-e-zauq-e-KHwaaree hai

[ chashm = eye, jins = things/items, zauq = taste ]

5. wohee sad_rang naala farsaayee
wohee sad_goona ashq_baaree hai

[ sad = hundred, naala farsaayee = lamenter, sad_goona = hundred
times, ashq_baaree = lamentation ]

6. dil hawa-e-KHiraam-e-naaz se fir
mahshristaan-e-beqaraaree hai

[ KHiraam = speed, mahshar = the last day/"qayaamat ka din",
mahshristaan = place of the last day ]

7. jalwa fir arz-e-naaz karta hai
roz-e-baazaar-e-jaaN_sipaaree hai

[ jalwa = splendour, jaaN_sipaaree = resigning one's life into
the hands of another ]

8. fir usee bewafa pe marte haiN
fir wohee zindagee hamaaree hai

9. fir khula hai dar-e-adaalat-e-naaz
garm baazaar-e-fauj_daaree hai

[ dar = abode, fauj_daaree = military court ]

10. ho raha hai jahaan meiN andher
zulf kee fir sarishta_daaree hai

[ sarishta_daaree = a regulator's position ]

11. fir kiya paara-e-jigar ne sawaal
ek fariyaad-o-aah-o-zaaree hai

[ paara = fragment ]

12. fir hue haiN gawaah-e-ishq talab
ashq_baaree ka hukm_zaaree hai

[ talab = search/desire/request, ashq_baaree = lamentation ]

13. dil-o-mizhgaaN ka jo muqadamaa tha
aaj fir uskee roob_qaaree hai

[ mizhgaaN = eyelids, roob_qaaree = to put the mind into work ]

14. be_KHudee be_sabab naheeN 'GHalib'
kuchch to hai jiskee pardaadaaree hai

[ be_KHudee = rapture, be_sabab = without any reason,
pardaadaaree = to hide, esp. fault ]

RC said...

Thanks for your comment. I appreciate genuine feedback. It will help me if you ca elaborate what's wrong and what could have been better.

God bless
RC

Pyaasa Sajal said...

Raj Sir aur Lovely Ji ka blog mein pehle to swaagat hai..umeed haai aage bhi aap log aate rahenge :)

aaj aap sabke saath Gaalib saab ko yaad karna achha lagaa...

aur Raj Ji,aap kisi se kam hai kya...

Pyaasa Sajal said...

Divya Di,Seema mam aur Ashish ka bhi shukriyaa...

Ashish ab to khud poetry mein ghus rahe ho..shayari mein interst le lo,help hogaa :)

Pyaasa Sajal said...

Alpana Mam..aapka intezar kaafi samy se tha...great to have u here

maine bhi ek news report dekha tha Ghalib Ji pe jahaan us jagah ko dekha jahaan unhone apne akhiri din bitaaye...smaarak waali baat sahi hai..hum log apni tarf se itna kar sakte hai khud unko respect karte rahe aur logo ko aur aware banaye inke baare mein...its unfortunate but Ghalib isnt as popular a name among the young generation as it should be...

Pyaasa Sajal said...

RC Ji..de diya hai wahaan apna comment...and u are most welcome

Abhishek said...

उनके देखे से आ जाती है मुँह पर रौनक।
वो समझते है बीमार का हाल अच्छा है।।
Aapke madhyam se Janab Galib ko yaad karne ka mauka mila, Shukriya.

Pyaasa Sajal said...

Abhishek Ji...bas yehi humara farz hai :)

Amit said...

अरे वाह भाई...यहाँ तो सही में महफिल जमी हुई है...गालिबजी तो हमें भी बहुत पसंद हैं.....लकिन ये शेर पहली बार पढ़ा..पढ़ कर मज़ा आ गया.....