Saturday, July 4, 2009

कभी कभी गुज़रा वक्त गुज़रता नही

एक शाम को एक दिन, एक,दिन चुपके से आया,
दिन बोला,मेरे बिन तू,
अब तक कैसे रह पाया,
मेरे बीत जाने के बाद,
वक्त तूने कैसे बिताया ।

मैने ही तेरा हाथ पकड़,
उसके हाथों मे दे डाला था,
मेरा दिया दीवानापन था तूने,
दिल का अरमान निकाला था, अचानक जो मैं पीछे छूट गया,
भला खुद को कैसे संभाला था।

गुमसुम सा ताक रहा था,
बीते दिन की परछाई को,
अपनी तड़प,मजबूरी सारी,
बता गया उस सौदाई को,
एक मोड़ पे तू पीछे छूटा, अगली गली पे वो आई थी,
तू तो बीत गया लेकिन,
तेरी याद दिल मे समाई थी, गुज़रा वक्त गुज़रता नही,
अपनी खूश्बू दे जाता है,
अपने पीछे तन्हाई को,
गुमसुम सा ताक रहा था,
बीते दिन की परछाई को...

24 comments:

हर्ष प्रसाद said...

बहुत सुंदर सजल.

हर्ष प्रसाद said...

बहुत सुंदर..

Pyaasa Sajal said...

shukriya...mere blog par aapka svaagat hai


@ all,
kuchh kaarano se lines thik se arranged nahi hai post me...iske liye maafi chahoonga...

अर्चना तिवारी said...

गुमसुम सा ताक रहा था,
बीते दिन की परछाई को,
अपनी तड़प,मजबूरी सारी,
बता गया उस सौदाई को,
एक मोड़ पे तू पीछे छूटा, अगली गली पे वो आई थी,
तू तो बीत गया लेकिन,
तेरी याद दिल मे समाई थी, गुज़रा वक्त गुज़रता नही,
अपनी खूश्बू दे जाता है,
अपने पीछे तन्हाई को,
गुमसुम सा ताक रहा था,
बीते दिन की परछाई को...


बहुत सुंदर रचना...दर्द से भरी

डॉ. मनोज मिश्र said...

लेखनी में धार है -लिखते रहिये.

राज भाटिय़ा said...

अपनी खूश्बू दे जाता है,
अपने पीछे तन्हाई को,
गुमसुम सा ताक रहा था,
बीते दिन की परछाई को...
वाह बहुत सुंदर
धन्यवाद

M VERMA said...

बिते दिन की परछाई --
बहुत खूब अच्छी रचना

mark rai said...

bahut badhiya...kaphi achchha laga aakar...aapko bhi thanks for visit on my blog....

Pyaasa Sajal said...

Thanks friends...

‘नज़र’ said...

बहुत ही बढ़िया रचना है

---
तख़लीक़-ए-नज़र

दिगम्बर नासवा said...

अपनी खूश्बू दे जाता है,
अपने पीछे तन्हाई को,
गुमसुम सा ताक रहा था,
बीते दिन की परछाई को...

सुन्दर लिखा है sajal जी............ अच्छा लगा पढ़ कर

महामंत्री - तस्लीम said...

किसी बात को कहने का ढंग कोई आपसे सीखे।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

बहुत ही बढ़िया रचना....धन्यवाद..

sada said...

अपनी तड़प,मजबूरी सारी,
बता गया उस सौदाई को,

बहुत ही बेहतरीन रचना बधाई ।

hem pandey said...

सुन्दर.

Nirmla Kapila said...

अपनी खूश्बू दे जाता है,
अपने पीछे तन्हाई को,
गुमसुम सा ताक रहा था,
बीते दिन की परछाई को...
सजल तुम्हारे नाम की तरह सुन्दर भावमय अभिव्यक्ति है आशीर्वाद्

Pyaasa Sajal said...

Shukriya aap sab kaa...Nirmala Ji aapka ashirvaad paake main dhany huaa

VaRtIkA said...

a loveable poem...........

vivek's....... said...

WOWWW !!

Reetika said...

Umda likha hai !! kabhi kabhi kuch pal ke katre jam jaate hain, shayad hum khud hi nahi chahte ki woh pal kabhi guzre..

Reetika said...

Jaane kya soch kar nahi guzra ! kabhi kabhi hum shayad chahte hi nahi ki kuch pal guzre..hum usi mein kahin na kahin jame rehna chahte hain...

Pyaasa Sajal said...

thank you everyone...

vivek's....... said...

WOWWW !!! :)

Nidhi said...

Beautiful :)