Monday, May 4, 2009

मुमकिन है मेरा प्रेमकवि बन जाना...



हम कहाँ थे समझे दिल का ये लगाना,


फ़िर भी लगा लिया दिल,नासमझी का कर बहाना।


यूँ तो मुमकिन नही की मोहब्बत की बाज़ी हार जाऊँ,


लेकिन मेरी फ़ितरत में है शामिल,तुमसे मात खाना।


तुमको भूले भी तो और कुछ खयाल ना रहा,


और याद रखा,तो भूल गये तमाम ज़माना।


मरना भी हमे कब कहाँ नागवार गुज़रा था,


लेकिन मुश्किल लगता है अब तुमको भुलाना।


फ़िर मुझे चांद मे तेरा चेहरा नज़र आया,


फ़िर आसां हो गया तुमपे कविता बनाना।


हवा भी जैसे हौले से कान में कुछ कहके गुज़री,


तुम्हारी तरह आ रहा है इसको भी बातें बनाना।


फ़िर हाथ उठाया मैने,फ़िर आसमां को छू लिया,


तेरे खयालों में डूबा रहूँ,तो मुमकिन है हर ऊँचाई को पाना।


तुम कहती हो हमारी मुलाकात एक इत्तफ़ाक है,


मैं कहता हूँ मेरी तकदीर है तेरा यूँ मिल जाना।


अपनी तो उम्र गुज़र गयी तुमको याद करते करते,


अब तो चाहता हूँ बस एक बार तुमको याद आना।


आज तक फ़कत दर्द के वाक्ये सुनाता रहा मैं,


अब तेरी मेहरबानी से मुमकिन है मेरा प्रेमकवि बन जाना।

2 comments:

गर्दूं-गाफिल said...

हवा भी जैसे हौले से कान में कुछ कहके गुज़री,
तुम्हारी तरह आ रहा है इसको भी बातें बनाना।



अच्छा शेर है
प्रेम कवि का दीवानापन दिखलाई देता है
ख्याल बहुत अच्छे हैं लेकिन
कसीदाकारी के लिए अभी बहुत गुंजाईश है
सुभकामनाएँ

Pyaasa Sajal said...

mere blog pe aapka swaagat hai...isi tarah aage bhi maargdarshan karte rahe :)