Monday, June 15, 2009

मैं एक बेरोज़गार हूँ



कल देखा एक आदमी को सड़क पर,


गाड़ी के नीचे आते आते बच गया,


आदतन वो ही शब्द निकल गये मुझसे,


देखकर नही चल सकते,अंधे हो क्या?



जवाब ने पर इस बार चौंका दिया,


जनाब, आँखों से अंधा तो नही हूँ,


पर बेरोज़गार हूँ,बस अंधेरा है मेरी


आँखों के आगे,हमेशा...हर वक्त,


हाँ दोस्त...मैं एक बेरोज़गार हूँ!!



उसकी बातों का ही असर था शायद,


जो उस बेरोज़गार से पूछ पड़ा मैं,


इस अंधेपन का कुछ करते क्यों नही,


उसका बोलना,मेरा चौंकना,जारी रहा,


इलाज तो करवाना चाहता हूँ मगर,


मरीज़ इतने बढ़े की दवा कम हो गयी,


अब ज़िंदगी मे रोशनी लाने के लिये,


अंधेरे मे बस भागे चला जा रहा हूँ,


हाँ दोस्त...मैं एक बेरोज़गार हूँ !!



इसके आगे मैने कुछ नही पूछा उससे,


पर वो बोलता ही चला गया, शायद,


मेरी आँखें अब भी सवाल कर रही थी,


कहने लगा की बेरोज़गारी की ये बीमारी,


गरीबी की गंदी गलियों मे बड़ी फ़ैलती है,


ऐसे ही संक्रमण का असर हुआ है मुझपे,


अब जैसे कुछ नही दिखता,सपने भी नही,


हार नही मानी है अब तक,पर लाचार हूँ,


हाँ... हाँ दोस्त... मैं, एक बेरोज़गार हूँ !!

18 comments:

Udan Tashtari said...

वाकई, इसके बीमार को बस अंधेरा ही नजर आ रहा है आज के दौर में.

राज भाटिय़ा said...

आप ने अपनी कविता मै बेरोज़गार ओर गरीब का बहुत अच्छा चित्ररण किया, काश कोई दुखी ना हो, सब के पास कम से कम खाने लायक तो हो

SWAPN said...

umda rachna, berojgari par sunder vyangta. badhai.

Nidhi Trivedi Mishra said...

Hey ! it's a good poem or I must say it is a reality. You have a good point of view...

M VERMA said...

मरीज़ इतने बढ़े की दवा कम हो गयी
bahut achchhi samvedana se bhari hui rachna

पल्लव said...

जब बीमार अधिक हो जाएँ तो दवा भी और ज्यादा होनी चाहिए, और यहाँ तो ऐसा कुछ भी नहीं दिखाई देता...

Science Bloggers Association said...

बेरोजगारी के बहाने आपने वर्तमान समाज की विद्रूपताओं पर अच्‍छी रोशनी डाली है।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

दिगम्बर नासवा said...

सच लिखा है सजल जी.....बेरोजगारी अपने आप में एक अभिशाप है, एक बीमारी है ............. इंसान अंधा हो जाता है, लाचार हो जाता है.......... पर उसके बस में इसका इलाज नहीं होता

Pyaasa Sajal said...

in shabdo ke liye aap sabka tahe dil se shukriyaa

ktheLeo said...

सजल ,
"मैं एक बेरोज़गार हूँ" एक सुन्दर रचना है जो भावपूर्ण भी है.

Thanks for being the "FIRST" commenter on a 25 year old creation. "सच में" पर आते रहें.

विनय « Vinay said...

आपने वाक़ई बख़ूबी ताज़ा हालात बयाँ किये हैं

vandana said...

berojgari ke dard ko bakhobi vyakt kiya hai aapne .,,.bahut aacchi lagi ye post ...

Pyaasa Sajal said...

shukriya dosto...is kavita pe jaisa response mila hai usse mujhe bahut khushi huyee hai :)

अनिल कान्त : said...

ek behtreen post hai ye

निर्झर'नीर said...

wahhhhhhhhhh

kya shabdo mai dhala hai aapne vaqt or haalaat se majboor insan ki vyatha ko

uniqe ni:sandeh kabil-e daad

aaj ki samasya ko kavy roop mai chitran kiya hai aapne

Priya said...

kya likha hain! ek sajeev chitran

Pyaasa Sajal said...

:)

VaRtIkA said...

amazingly beautiful... sach mein bahut bahut acchi rachnaa... adhik kuch kehnaa vyarth hoga...